रविवार, 17 मई 2009

ग़ज़ल

कबसे तेरे ख्वाब मेरी आंखों में पलते हैं ,
दूर -दूर रहकर भी हम -तुम साथ तो चलते हैं

हाथ में हाथ दिए बैठे हैं, देखो दोनों सबसे दूर ,
हैं अंजान के जाडों में दिन जल्दी ढलते है

अपना कोई घर ,कमरा या पेड़ नहीं ,
आवारा पंछी रोजाना ठौर बदलते हैं

आज अभी तो खुल के जी लें ,कल की कौन कहे
सड़क -सड़क पर रोज़ मौत के दस्ते चलते हैं

ये हों, वो हों कोई भी हों हमको क्या करना
शीश बदलने से क्या तख्तो -ताज बदलते
है ।

सीमा

16 टिप्‍पणियां:

  1. हाथ में हाथ दिए बैठे हैं, देखो दोनों सबसे दूर ,
    हैं अंजान के जाडों में दिन जल्दी ढलते है ।

    ये हों, वो हों कोई भी हों हमको क्या करना
    शीश बदलने से क्या तख्तो -ताज बदलते है ।

    वाह सीमा जी वाह...दोनों ही शेर ताजगी लिए हुए हैं...पूरी ग़ज़ल ही उम्दा है...बहुत आनंद आया पढ़ कर...शुक्रिया.
    नीरज

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  2. मनोभाव का सुन्दर दर्पण

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  3. ये हों, वो हों कोई भी हों हमको क्या करना ।
    शीश बदलने से क्या तख्तो -ताज बदलते है ।

    waah !!
    bahut hi mn-bhaavan aur saarthak
    ghazal kahi hai aapne .
    badhaaee svikaarein .

    ---MUFLIS---

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  4. अपना कोई घर ,कमरा या पेड़ नहीं ,
    आवारा पंछी रोजाना ठौर बदलते हैं ।

    वाह.....जीवन का दर्शन है इस शेर में...........
    लाजवाब ग़ज़ल है ....आपका ये रूप तो hamen pataa ही नहीं था.......बहुत khoob likhti हैं आप

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  5. सीमा जी
    ग़ज़ल का ये शेर बहुत पसंद आया -

    कबसे तेरे ख्वाब मेरी आंखों में पलते हैं ,
    दूर -दूर रहकर भी हम -तुम साथ तो चलते हैं ।

    लिखते रहिएगा.
    - विजय

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  6. seema ji , bahut hi behatreen gazal , specially ye waal sher

    कबसे तेरे ख्वाब मेरी आंखों में पलते हैं ,
    दूर -दूर रहकर भी हम -तुम साथ तो चलते हैं ।

    itni shashakt abhivyakti ke liye meri badhai sweekar karen..

    vijay

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  7. सच हमें क्या करना है....यू दिल में हज़ार दिए जलते है

    कभी सोम-रस पे भी आयें और पढ़े

    http://somadri.blogspot.com/2009/05/taj-or-tejo.html
    ------------------

    http://som-ras.blogspot.com/2009/05/blog-post.html

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  8. आपने दिल की महफ़िल बड़े शौक और खूबसूरती से सजायी है सीमा जी !
    अपना परिचय इतने कम शब्दों में पूरी प्रभावशीलता और ईमानदारी से दिया , क्या बात है , बहुत खूब.
    अनुभूति की गहराई ने शिल्प के अनगढ़पन को नज़रंदाज करने की जायज़ वज़ह दे दी है . सच्चाई का सौन्दर्य अद्भुत होता है , आपके चहरे पर सच के औटोग्राफ हैं .
    ब्लॉग पर आनंद पाया आपके , धन्यवाद. खूब लिखती पढ़ती रहिएगा . शुभकामनाएं !
    आप भी हमारे ब्लॉग पर आइयेगा !

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  9. सहज भावाभिव्यक्ति......... बधाई स्वीकारें....

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  10. ये हों, वो हों कोई भी हों हमको क्या करना ।
    शीश बदलने से क्या तख्तो -ताज बदलते है ।

    बहुत खूब

    तार से तार जोड़ता हुआ पहली बार आपके
    ब्लॉग पर आया हूँ ! आकर ख़ुशी हुयी !

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  11. शीश बदलने से क्या तख्तो -ताज बदलते है ।
    उम्दा गज़ल

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  12. बहुत खूबसूरत एहसास की रचना

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    धनयवाद ...
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